24 साल तक के युवा वोट देते हैं, ले क्यों नहीं सकते?

वोटिंग का अधिकार 18 साल से मगर चुनाव लड़ने का हक 25 साल होने पर उठे सवाल

राजेश कुमार पाठक

राजनीति में युवाओं के आने की उम्मीद की जाती है। मगर, जो युवा वोटिंग का अधिकार मिलने के फौरन बाद राजनीति में आते हैं उन्हें सात साल के अधिकार के बाद ही वोट लेने का अधिकार मिल पाता है। पिछले साल राजनीति में आकर धमाल मचाने और मीडिया का ध्यान खींचने वाले हार्दिक पटेल को इस बार गुजरात में चुनाव लड़ने का मौका नहीं मिलेगा। वे वर्ष 2019 में मेरा मानना है कि जब किसी व्यक्ति में नेतृत्वकर्ता को चुनने की क्षमता विकसित है, ऐसा 25 साल के होंगे। राजनीति में इसी हालत के कारण 48-50 साल के अधेड़ को युवा नेता संबोधित किया जाता है। इसी सवाल पर कवि व लेखक राजेश कुमार पाठक का विचार पढ़ें।

जब किसी को ‘मत देने का संवैधनिक अधिकार’ मिलता है, उसी समय उसे निर्वाचित होने का भी अधिकार मिल जाना चाहिए। 18 साल उसे उससे अधिक उम्र के युवाओं में नेतृत्व की क्षमता से इंकार नहीं किया जा सकता है। सरकार भी मानती है कि जब कोई भी सामान्य नागरिक 18 वर्ष का हो जाता है तो उसे व्यस्क मताधिकार मिल जाता है। इस क्षमता से वह अपने नेतृत्वकर्ता को चुन सकता है। जब किसी व्यक्ति में सही-गलत में अंतर करने की क्षमता इस उम्र में हो जाती है तो उन्हें स्वयं नेतृत्वकर्ता की भूमिका निभाने के लिए अगले न्यूनतम 7 वर्षों तक और किस अनुभव के लिए इंतजार कराया जाता है?

तर्क यह है कि किसी को किसी उद्देश्य के लिए चुनना एक तार्किक एवं अनुभवजन्य विधा है, जिसमें खुद ही अनुभव व आंतरिक-बाह्य ज्ञान और सकारात्मक परिकल्पना की आवश्यकता होती है। जब हमारा संविधान यह स्वीकार करता है कि किसी खास उम्र (18) वर्ष में लोगों में परिपक्वता व अनुभव क्षमता विकसित है तो उन्हें स्वयं के भी उसी उम्र में चुने जाने का अधिकार क्यों नहीं? इसलिए यह विषय महत्वपूर्ण हो जाता है कि जब हमें अच्छे-बुरे, देशहित, समाजहित व स्वहित आदि में अंतर करने की क्षमता लेकर चयन करने की शक्ति है तो स्वयं के ही उसी उम्र में चुने जाने के अधिकार से क्यों वंचित रहें? इतना ही नहीं, अगर हम आपराधिक कृत्य की बात करें तो पता चलता है कि अब तो न्यायिक प्रक्रिया व व्यवस्था भी बाल अपराध की श्रेणी में मान्य उम्र को और भी घटा देने पर समुचित विचार कर रही है। उसे तो और भी लगने लगा है कि लोगों में परिपक्वता 18 वर्षों से बहुत पहले ही आ जाती है।

गलत या सही का निर्णय अब 18 वर्ष से कम उम्र के लोग आसानी से कर लेते हैं। सो, बाल अपराधी तभी वे कहलाएंगे जब वे 16 वर्ष तक की उम्र के हैं। अर्थात यह मान लेने में हमें कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए कि 18 वर्ष की उम्र प्राप्त होते ही हमें व्यस्क मताधिकार प्राप्त हो जाता है व हम देश-राज्य के भाग्यविधाता को चुनने में संवैधानिक तौर पर अधिकृत हो जाते हैं। जब कोई व्यक्ति 18 वर्ष की उम्र में चुने जाने की वास्तविक क्षमता या फिर योग्यता नहीं प्राप्त करता है, अर्थात चुने जाने के लिए वह अपरिपक्व नागरिक है तो फिर उसे देश-राज्य के सही नेतृत्वकर्ता को चुनने में परिपक्व नागरिक कैसे माना जा सकता है।

यह मानने में कोई आपत्ति नहीं कि देश-राज्य के राजनीतिक या अन्य प्रशासन चलाने के लिए योग्यता के साथ-साथ अनुभव भी आवश्यक कारक है तो फिर क्या बिना कोई सक्रिय गतिविधि के ही सिर्फ 25 वर्ष की उम्र प्राप्त हो जाने से उस नागरिक को राजनीति या अन्य मामलों में अनुभवी मान लिया जाना चाहिए। जो कि, सामान्यतया उसे चुने जाने के अधिकार को संपुष्ट कर देता हो। क्योंकि, विधानसभा या लोकसभा की सदस्यता प्राप्त करने के लिए तो किसी ढ़ंग के अनुभवों को तो अनिवार्य नहीं बनाया गया है।

यह मान लेने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए कि समाज या उसके अंतर्गत गठित किसी संस्था-समूह के अंतर्गत नेतृत्व कर चुके व्यक्ति को ही वृहत्तर नेतृत्व करने का विशेष अवसर प्रदान किया जाना चाहिए। इससे देश-राज्य को एक अनुभवी नेतृत्वकर्ता प्राप्त हो सकेगा व उनके अनुभवों और गुणों का लाभ पूरे राज्य-देश को प्राप्त हो सकेगा। यह अपने और अन्य देशों की राजनीतिक प्रशासनिक व्यवस्थापकों के लिए हास्यास्पद ही प्रतीत होता है कि बिना किसी सांगठनिक नेतृत्व क्षमता एवं कोरा अनुभव के मात्र सहानुभूति या इससे जुड़े अन्य मापदंड अपने देश में नेतृत्वकर्ता के चयन में प्रभावी भूमिका निभाती है जो कि देश एवं राज्य के अपरिपक्व प्रजातंत्र होने के संपूर्ण कारण को परिलक्षित करता है।

गहराई से अघ्ययन करें तो पता चलता है कि 18 से 25 वर्षों के बीच जो सात वर्षों का अंतर, जो चुनने या चुने जाने के बीच है, वह बेमानी है। यह गैप ये प्रमाणित करने में सर्वदा विफल है कि उस अंतर से इतनी क्षमता एवं इतनी परिपक्वता आ जाती है जो कि देश-राज्य के नेतृत्व करने के लिए आवश्यक है और उसके विपरीत 18 वर्ष की उम्र में वही क्षमता एकदम नहीं विकसित होती है।

अधिकार तो संवैधानिक तौर पर प्राप्त होता है। मगर, वे स्वयं जनप्रतिनिधि बनने के प्रत्याशी नहीं हो सकते। जनप्रतिनिधियों की औपचारिक योग्यता को लेकर देश में हमेशा बहस छिड़ती रही है एवं सामान्य तथा विशिष्ट तौर पर इस तर्क को सर्वदा झुठलाया गया है कि उन्हें औपचारिक योग्यता वाला होना चाहिए। मगर यदि उन्हें औपचारिक शिक्षा प्राप्त न भी हो तो इतना तो आवश्यक है ही कि उन्हें समाज में नेतृत्व क्षमता जैसे गुणों का अनुभव होना ही चाहिए, जिसकी आवश्यकता स्वीकारी जाती रही है। क्योंकि, उनकी औपचारिक शैक्षणिक योग्यताओं की कमी को उनके सलाहकार दूर कर देंगे, लेकिन वे सचिव जिन्हें राजनीतिक अनुभव नहीं होता, जिसका कि किसी भी नेतृत्वकर्ता जनप्रतिनिधि के लिए होना नितांत आवश्यक है, उनके नीति-निर्धारण की प्रक्रिया ;क्मउवबतंजपब क्पसमउउंद्ध में समुचित भूमिका अदा नहीं कर सकते।

उपर्युक्त परिप्रेक्ष्य में अगर आवश्यकता हो तो जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धाराओं में आवश्यक संशोधनोपरांत लोकसभाध्विधानसभा के सदस्य हेतु चुनाव लड़ने के लिए उम्मीदवारों की आवश्यक अर्हताओं में भले ही औपचारिक शैक्षणिक योग्यता, किसी खास सीमा तक, को समावेशित नहीं किया जाय तथापि राजनीतिक, सामाजिक नेतृत्वकर्ता के रूप में प्राप्त औपचारिक अनुभवों को उनकी अर्हता में आवश्यक रूप से समावेशित किया जाना चाहिए। ऐसा समावेश भले ही हमें प्रसिद्ध राजनीतिक चिंतक जे.एस.मिल द्वारा जनप्रतिनिधि के लिए निर्धारित औपचारिक योग्यता के हूबहू अनुसरण नहीं करता हो तथापि अनुभवजन्य योग्यता का निर्धारण किये जाने से बहुत हद तक उनकी आत्मा के करीब हम अपने को पाते है जिसमें उन्होंने स्पष्ट किया था कि जनप्रतिनिधियों को चुने जाने के लिए निर्धारित अर्हताओं में उतना तो होना ही चाहिए कि उन्हें सामान्य ज्ञान एवं अंकगणित जैसे व्यावहारिक विषयों का ज्ञान हो ।

सुझाए गए उपायों को अगर हम नकार भी देते हैं तो इस संवैधानिक सच से कैसे इंकार किया जा सकता है कि भारतीय संविधान में 61वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा जब वयस्क मताधिकार की उम्र सीमा 21 वर्ष से घटाकर 18 वर्ष की गयी थी तब उस वक्त भी निर्वाचित होने के लिए उम्र सीमा 25 वर्ष ही रखी गयी थी जबकि हम तटस्थ भाव से अघ्ययन करें तो उसी वक्त निर्वाचित होने के लिए कम से कम समानुपातिक ढ़ंग से न्यूनतम उम्र सीमा 25 वर्ष से घटाकर 22 वर्ष तो कर ही दी जानी चाहिए थी, जो कि आज तक नहीं हुआ। वास्तव में देखा जाए तो यह विषय अत्यंत ही संवैधानिक महत्व एवं जनहित का है। अब इसे प्रजातांत्रिक दुविधा (Democratic Dilemma) का शिकार होने से बचाने के लिए स्पष्ट जनमत निर्माण की आवश्यकता है।

लेखक- राष्ट्रीय कवि संगम, झारखंड इकाई के प्रांतीय सचिव है।

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