गरीबों ने बैंकों को दिया और धनकुबेर बना गये कंगाल

एक साथ आये दो आंकड़े हैं दिलचस्प, करीब 9 हजार करोड़ बैकों में जमा कर भूल गये गरीब और धनकुबेरों ने डकारा 7.33 लाख करोड़

देश के सरकारी बैंकों से 7 लाख 33 हजार करोड़ रुपया लोन लेकर धनकुबेरों को लोन चुकाना याद नहीं रहा। जबकि देश के लाखों गरीब लोग ऐसे हैं जिनके अकाउंट में दो सौ से लेकर डेढ़ हजार रुपये कबसे पड़े हैं, मगर वे इसे भूल चुके हैं। लगभग साथ-साथ आये इन दो आंकड़ों से आप देश के रईसों-कारपोरेटों और गरीबों के चरित्र को समझ सकते हैं। आंकड़ों के अनुसार देश के बैंकों की फंसी रकम (एनपीए) में 14 फीसदी भागीदारी उन डिफाॅल्टरों की है, जो पैसे चुकाने में समर्थ हैं-मगर बकाया चुकाना नहीं चाहते।

दूसरी ओर बैंकों में साढ़े आठ हजार करोड़ रुपये से अधिक ऐसा जमा है जिसका कोई दावेदार नहीं है। माना जा रहा है कि सरकार की ओर से केवाईसी के नियमों में की गयी सख्ती से ऐसे खातों की संख्या बढ़ गयी है। कई खाताधारक की मौत होने पर अब बैंक तभी किसी को उनके पैसे निकालने देता है, जब पैसा मांगने वाला शख्स उस खाताधारक से अपना करीबी रिश्ता स्थापित करने वाला दस्तावेज लाये। बैंकों में पड़ा ज्यादातर पैसा इसी श्रेणी का है।

उधर बैंकों का करीब एक लाख करोड़ रुपए का लोन उन धनकुबेरों ने लिया है जो आराम से लोन चुकता करने की हैसियत में है। इन्हें ‘विलफुल डिफाल्टर’ कहा जाता है। देश के 21 बड़े सरकारी बैंकों का लगभग 7.33 लाख करोड़ रुपया एनपीए की श्रेणी में है। मसलन यह राशि देश की अर्थव्यवस्था में काम नहीं आ रही। जबकि गरीबों के पास छोटी-छोटी रकम करके 30 फीसदी से कम ही बैंकों का लोन है। साथ ही इसकी रिकवरी का रिकाॅर्ड भी 90 फीसदी के लगभग है। लेकिन देश का ज्यादातर धनकुबेर पैसे लेकर डकारने में माहिर हो चुका है। इसलिए उनसे लोन की रिकवरी का औसत गरीबों के मुकाबले काफी कम है।

जो हो, सरकारी बैंकों ने विजय माल्या सहित 9025 डिफाॅल्टरों की एक लिस्ट जारी की है। इनमें 8423 डिफाॅल्टरों पर बैंकों ने कानूनी कार्रवाई शुरू की है। जबकि 1968 डिफाॅल्टरों के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज करायी गयी है। लगभग 31 हजार करोड़ रुपया इन पर बकाया हैं। दूसरी ओर करीब 87 हजार करोड़ रुपया लेकर बैठे हुए 6937 लोगों और कंपनियों की संपत्तियां जब्त करने और उन्हें बेचकर पैसा वसूलने की कवायद हो रही है। संसद में पेश आरबीआई की रिपोर्ट बताती है कि विजया बैंक के कुल एनपीए में 53 फीसदी विलफुल डिफाॅल्टरों की हिस्सेदारी है। ऐसे में विजया बैंक सारे बैंकों में सबसे आगे है। जबकि 1.9 लाख करोड़ रुपये की रकम के साथ स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के एनपीए का आंकड़ा सबसे विशाल है।

कुल एनपीए में 77 फीसदी हिस्सेदारी बड़े कॉरपोरेट घरानों की है। ऐसा सितंबर 2017 तक के आंकड़े बताते हैं। फिलहाल, जो जितना बड़ा नाम है, वह उतना ही बड़ा डिफाॅल्टर भी है। मसलन, व्यावसायिक शुचिता या कॉरपोरेट गवर्नेंस की बात को बड़े घराने ठेंगे पर रख रहे हैं। जानकारों की मानें तो पिछला रिकॉर्ड देखकर यही लगता है कि बैंकों के लिए इस रकम की वापसी आसान नहीं होगी।

हालांकि गरीबों-मध्यवर्गीय लोगों के व्यक्तिगत खातों का आंकड़ा भी अजीब है। आरबीआई की जारी ताजा रिपोर्ट के मुताबिक अलग-अलग बैंकों के 2.63 करोड़ खातों में पड़े 8,864.6 करोड़ रुपये का क्लेम कोई नहीं कर रहा है। यह आंकड़े दिसंबर 2016 तक के हैं। वर्ष 2012 से 2016 यानी पिछले चार सालों में इस तरीके का पैसा दोगुना हो गया है। ऐसे खातों की संख्या वर्ष 2012 में महज 1.32 करोड़ थी जो वर्ष 2016 में 2.63 करोड़ हो गयी थी। वर्ष 2012 में इन खातों में जमा पैसा 3,598 करोड़ रुपये था जो वर्ष 2016 में 8,864 रुपये हो गया।

इधर आरबीआई ने बैंकों से कहा है कि पिछले 10 सालों से जिन खातों का कोई दावेदार सामने नहीं आया है, उनकी लिस्ट तैयार करके सभी बैंक अपनी-अपनी वेबसाइट पर डालें। इस जानकारी में अकाउंट होल्डर्स के नाम, अड्रेस भी शामिल होंगे। हालांकि बैंकों के कारोबार का भी कुछ उसूल होता है। इसके अनुसार जिस पैसे का कोई दावेदार नहीं होता वह भी बैंक का घाटा ही करवाता है। क्योंकि, उन खातों पर ब्याज देना बैंक बंद नहीं कर सकते।

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